आज के न्यूज़ चैनल: जवाबदेही का मंच या शब्दों का युद्ध?
लोकतंत्र शायद ही कभी इसलिए समाप्त होता है कि चुनाव होना बंद हो जाएँ।
वह तब कमजोर पड़ने लगता है, जब नागरिक सत्ता से प्रश्न पूछना छोड़ देते हैं।
किसी सरकार से सवाल करना केवल इसलिए कठिन नहीं हो जाता कि उसके पास संसद में बहुमत है, बल्कि इसलिए भी कि समाज का एक बड़ा वर्ग तथ्यों से अधिक निष्ठा को महत्व देने लगता है। दूसरी ओर, जब विपक्ष सत्ता में आए, तो उससे भी उतनी ही कठोर जवाबदेही अपेक्षित होनी चाहिए। लोकतंत्र में जवाबदेही इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए कि सत्ता में कौन है।
जनमत को आकार देने वाली सबसे प्रभावशाली संस्थाओं में आज समाचार चैनल प्रमुख स्थान रखते हैं।
प्राइम-टाइम की बहसों को लोकतांत्रिक विमर्श और जवाबदेही का मंच बताया जाता है। लेकिन अनेक दर्शकों का अनुभव है कि इन बहसों का उद्देश्य सत्य की खोज कम और किसी एक पक्ष को विजेता घोषित करना अधिक होता है। तर्क और प्रमाण पीछे छूट जाते हैं, जबकि शोर, आरोप-प्रत्यारोप और वाक्-कौशल चर्चा पर हावी हो जाते हैं।
यही प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।
सबसे सामान्य रणनीति: "उनका क्या?"
कल्पना कीजिए कि बहस की शुरुआत एक सीधे और स्पष्ट प्रश्न से होती है—
"इस सरकारी परियोजना में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। सरकार इस पर क्या कहेगी?"
उत्तर मिलने की अपेक्षा होती है।
लेकिन जवाब आता है—
"पिछली सरकार ने जो भ्रष्टाचार किया था, उसका क्या?"
दर्शक तालियाँ बजाते हैं।
एंकर अगले मुद्दे पर बढ़ जाता है।
और मूल प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है।
तर्कशास्त्र में इसे "व्हाटअबाउटरी (Whataboutery)" कहा जाता है। इसमें आरोप का उत्तर तथ्यों से नहीं दिया जाता, बल्कि किसी और की कथित गलती का उल्लेख करके चर्चा का केंद्र बदल दिया जाता है। अनेक शोध बताते हैं कि यह रणनीति वास्तविक प्रश्न से ध्यान हटाने का काम करती है, उसका उत्तर देने का नहीं।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—
क्या मूल आरोप का उत्तर मिला?
नहीं।
यदि कल का भ्रष्टाचार आज के भ्रष्टाचार का औचित्य बन जाए, तो फिर किसी भी सरकार से कभी जवाबदेही नहीं माँगी जा सकेगी।
एक अपराध दूसरे अपराध का बचाव नहीं बन सकता
मान लीजिए पुलिस ने किसी चोर को पकड़ लिया।
चोर कहे—
"और भी बहुत से चोर खुले घूम रहे हैं।"
क्या न्यायालय उसे इसलिए छोड़ देगा?
बिल्कुल नहीं।
न्याय का सिद्धांत कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति का मूल्यांकन उसके अपने कृत्य के आधार पर होगा।
राजनीति में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए।
यदि सरकार 'अ' ने गलत किया है, तो उसकी जाँच होनी चाहिए।
यदि सरकार 'ब' ने गलत किया है, तो उसकी भी जाँच होनी चाहिए।
एक की गलती दूसरे की ढाल नहीं बन सकती।
बहसों में अपनाई जाने वाली अन्य सामान्य रणनीतियाँ
1. विषय बदल देना
बहस महँगाई से शुरू होती है।
कुछ ही मिनटों में चर्चा इतिहास, धार्मिक विवाद या किसी असंबंधित अंतरराष्ट्रीय विषय पर पहुँच जाती है।
जिस मुद्दे पर बहस शुरू हुई थी, वही गायब हो जाता है।
2. तथ्यों के बजाय व्यक्ति पर हमला
प्रश्न का उत्तर देने के बजाय प्रश्न पूछने वाले पर ही आरोप लगाए जाते हैं—
"आप देश-विरोधी हैं।"
"आपको अपने देश से प्रेम नहीं है।"
"आपकी पार्टी तो इससे भी बदतर है।"
"आप पक्षपाती हैं।"
ऐसे कथन भावनाएँ भड़का सकते हैं, लेकिन तथ्यात्मक प्रश्नों का उत्तर नहीं देते।
3. झूठा राष्ट्रवाद
कई बार यह भ्रम पैदा किया जाता है—
"या तो सरकार का समर्थन कीजिए, या फिर आप राष्ट्र-विरोधी हैं।"
यह लोकतांत्रिक सोच नहीं है।
सरकारें बदलती रहती हैं।
राष्ट्र बना रहता है।
सरकार से प्रश्न पूछना नागरिक का अधिकार है, राष्ट्र के प्रति निष्ठा की कमी नहीं।
4. लगातार बीच में टोकना
बहस धीरे-धीरे संवाद से अधिक शोर में बदल जाती है।
जो सबसे ऊँची आवाज़ में बोलता है, वही प्रभावशाली दिखाई देता है।
शोर कई बार तर्क का स्थान ले लेता है।
5. चुनिंदा तथ्य प्रस्तुत करना
केवल वही आँकड़े दिखाए जाते हैं जो किसी एक पक्ष के अनुकूल हों।
विरोधी तथ्यों को या तो नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है या बहुत कम स्थान मिलता है।
एक जागरूक नागरिक को हमेशा पूछना चाहिए—
"मुझे क्या नहीं बताया जा रहा?"
6. भावनाओं का अतिरेक
तेज़ संगीत, उत्तेजक दृश्य, राष्ट्रवादी नारे, भय, क्रोध और उत्तेजना—ये सब कई बार शांत और तथ्याधारित चर्चा का स्थान ले लेते हैं।
जहाँ भावनाएँ हावी होती हैं, वहाँ विवेकपूर्ण सोच कमजोर पड़ जाती है।
7. असंतुलित पैनल
कभी-कभी बहस शुरू होने से पहले ही उसका संतुलन बिगाड़ दिया जाता है।
एक पक्ष के समर्थन में कई वक्ता होते हैं, जबकि दूसरे पक्ष का प्रतिनिधित्व केवल एक व्यक्ति करता है।
ऐसे में निष्पक्ष चर्चा की संभावना स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है।
8. अदालत से पहले मीडिया का फैसला
कई कानूनी मामलों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है मानो न्यायालय का निर्णय आने से पहले ही दोष सिद्ध हो चुका हो।
मीडिया का दायित्व जाँच करना है।
निर्णय देना न्यायालय का कार्य है।
इन दोनों भूमिकाओं का मिश्रण न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को कमजोर करता है।
फिर भी ये बहसें लोगों को प्रभावशाली क्यों लगती हैं?
इसका उत्तर राजनीति से अधिक मनोविज्ञान में छिपा है।
लोग स्वाभाविक रूप से वही बातें स्वीकार करना पसंद करते हैं जो उनकी पहले से बनी मान्यताओं की पुष्टि करें।
धीरे-धीरे राजनीतिक पसंद व्यक्ति की पहचान का हिस्सा बन जाती है। तब किसी नेता की आलोचना, स्वयं की आलोचना जैसी महसूस होने लगती है।
कई लोग राजनीति को लोकतांत्रिक विमर्श नहीं, बल्कि क्रिकेट मैच की तरह देखने लगते हैं—
"मेरी टीम हर हाल में जीतनी चाहिए।"
ऐसी स्थिति में सत्य से अधिक महत्वपूर्ण जीत बन जाती है।
इसके साथ ही, किसी दावे को बार-बार सुनने से वह लोगों को अधिक विश्वसनीय लगने लगता है, चाहे उसके समर्थन में पर्याप्त प्रमाण न हों।
अधिकांश नागरिकों के पास हर दावे की जाँच करने का समय भी नहीं होता। इसलिए वे प्रमाणों की अपेक्षा आत्मविश्वास और आक्रामकता से प्रभावित होने लगते हैं।
मीडिया की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी
पत्रकारिता का उद्देश्य न तो सरकार की रक्षा करना है और न ही विपक्ष की।
उसका सबसे बड़ा दायित्व नागरिकों के जानने के अधिकार की रक्षा करना है।
यदि कोई समाचार चैनल सत्ता से कठिन प्रश्न नहीं पूछता, तो वह लोकतंत्र को कमजोर करता है।
यदि कोई चैनल विपक्ष से प्रश्न नहीं पूछता, तो वह भी अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहता है।
मीडिया से जवाबदेही की अपेक्षा सभी के लिए समान होनी चाहिए, चाहे उसका वैचारिक झुकाव कुछ भी हो।
नागरिकों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी
अगली बार जब आप कोई राजनीतिक बहस देखें, तो स्वयं से पाँच प्रश्न अवश्य पूछें—
क्या मूल प्रश्न का उत्तर दिया गया?
क्या दावों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत किए गए?
क्या स्वतंत्र और विश्वसनीय स्रोतों का उल्लेख किया गया?
क्या चर्चा का विषय बदल दिया गया?
क्या तर्क की जगह भावनाओं का सहारा लिया गया?
इन प्रश्नों के उत्तर जानना अक्सर इस बात से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है कि बहस में "जीता" कौन।
लोकतंत्र को स्वतंत्र सोच वाले नागरिक चाहिए
लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा मतभेद नहीं है।
सबसे बड़ा खतरा है—बिना सोचे-समझे सहमत हो जाना।
एक सशक्त लोकतंत्र उन्हीं नागरिकों के बल पर खड़ा रहता है जो हर सरकार, हर राजनीतिक दल, हर समाचार चैनल और यहाँ तक कि अपनी स्वयं की मान्यताओं की भी आलोचनात्मक समीक्षा करने का साहस रखते हैं।
यदि कोई व्यक्ति बिना प्रमाण देखे किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करता है, तो उसका समाधान उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर करना नहीं है। बल्कि उसे और स्वयं को विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करने, तथ्यों की जाँच करने और भिन्न मतों को सम्मानपूर्वक सुनने के लिए प्रेरित करना है।
मतदान का अधिकार प्रत्येक योग्य नागरिक का समान अधिकार है।
लेकिन इस अधिकार के साथ एक गम्भीर उत्तरदायित्व भी जुड़ा है—
मतदान भय, आदत या दलगत निष्ठा के आधार पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र, सूचित और विवेकपूर्ण सोच के आधार पर होना चाहिए।
सरकारें तभी जवाबदेह बनती हैं, जब नागरिक अपना विवेक किसी और के हाथों में सौंपने से इंकार कर देते हैं।
जिस दिन हम यह पूछना छोड़ देंगे कि "बहस कौन जीता?" और यह पूछना शुरू करेंगे कि "मूल प्रश्न का उत्तर किसने दिया?", उसी दिन हमारा लोकतंत्र और अधिक सशक्त होगा।
और अंत में एक प्रश्न, जिस पर प्रत्येक मतदाता को स्वयं विचार करना चाहिए—
यदि किसी मतदाता को यह लगता है कि आज लगे किसी आरोप का उत्तर केवल अतीत के किसी दूसरे आरोप का उल्लेख करके दिया जा सकता है, तो क्या वह वास्तव में राजनीतिक जवाबदेही का निष्पक्ष मूल्यांकन कर रहा है?
या वह किसी एक पक्ष से इतना भावनात्मक रूप से जुड़ चुका है कि उसे उत्तर और विषयांतर में अंतर ही दिखाई नहीं देता?
क्या ऐसा मतदाता अपने मताधिकार का उपयोग पूर्ण विवेक के साथ कर रहा है?
निर्णय आपका है। आत्मचिंतन कीजिए।