नरेंद्र मोदी सरकार (2014–2026): वादे, उपलब्धियाँ और उन पर उठे सवाल

प्रस्तावना

साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली, तब उन्हें देश के इतिहास के सबसे प्रचंड जनादेशों में से एक प्राप्त हुआ। उनके चुनाव अभियान का केंद्र था—आर्थिक विकास, सुशासन, भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था, बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन और भारत को विश्व की अग्रणी आर्थिक शक्तियों में शामिल करना।

पिछले एक दशक से अधिक समय में सरकार ने कई महत्वाकांक्षी योजनाएँ शुरू कीं, आधारभूत संरचना (Infrastructure) के विकास पर अभूतपूर्व निवेश किया, डिजिटल सेवाओं का विस्तार किया, कल्याणकारी योजनाओं को व्यापक स्तर तक पहुँचाया और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की भूमिका को पहले से अधिक मजबूत बनाने का प्रयास किया।

लेकिन हर सरकार की तरह इस कार्यकाल का दूसरा पक्ष भी है। आलोचकों का कहना है कि कई बड़े चुनावी वादे या तो अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए या अब भी अधूरे हैं। बेरोज़गारी, महँगाई, आर्थिक असमानता, संस्थाओं की स्वायत्तता, सामाजिक सौहार्द और लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे मुद्दों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

यह लेख सरकार की उपलब्धियों का खंडन या समर्थन करने के बजाय उन प्रमुख वादों और उनके परिणामों के बीच दिखाई देने वाले अंतर तथा उन पर उठी आलोचनाओं को समझने का प्रयास है।

भाग 1 : वर्ष 2014 का चुनाव और "अच्छे दिन" का वादा

1. "अच्छे दिन आएंगे"

वादा

देश में आर्थिक समृद्धि आएगी।

महँगाई पर नियंत्रण होगा।

युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

आम नागरिक का जीवन स्तर बेहतर होगा।

आलोचना

युवाओं में बेरोज़गारी लगातार चिंता का विषय बनी रही।

महँगाई ने आम परिवारों के घरेलू बजट पर दबाव बनाए रखा।

वेतन वृद्धि, जीवन-यापन की बढ़ती लागत के अनुरूप नहीं हो सकी।

2. विदेशों से काला धन वापस लाना

वादा

विदेशों में जमा अवैध धन वापस लाया जाएगा।

काले धन पर रोक लगेगी।

भ्रष्टाचार कम होगा।

आलोचना

बड़े पैमाने पर काला धन वापस आने के स्पष्ट प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए।

भ्रष्टाचार को लेकर सवाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुए।

बाद के वर्षों में राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता भी विवाद का विषय बनी।

3. "Minimum Government, Maximum Governance"

वादा

प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाया जाएगा।

नौकरशाही की जटिलताएँ कम होंगी।

शासन व्यवस्था अधिक जवाबदेह और पारदर्शी होगी।

आलोचना

आलोचकों का कहना है कि समय के साथ निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक केंद्रीकृत होती गई और महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्वायत्तता पहले की तुलना में कमज़ोर होती दिखाई दी।

भाग 2 : पहला कार्यकाल (2014–2019)

4. स्किल इंडिया

वादा

देश के करोड़ों युवाओं को ऐसा कौशल प्रदान करना जिससे उन्हें बेहतर रोजगार मिल सके।

आलोचना

कौशल विकास कार्यक्रमों के बावजूद पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध नहीं हो सके।

शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी ऊँचे स्तर पर बनी रही।

5. मेक इन इंडिया

वादा

भारत को विश्व का प्रमुख विनिर्माण (Manufacturing) केंद्र बनाना।

आलोचना

GDP में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी अपेक्षित गति से नहीं बढ़ सकी।

अनेक उद्योग अब भी आयातित पुर्जों पर निर्भर रहे।

आलोचकों का कहना है कि वास्तविक उत्पादन की तुलना में असेंबली आधारित उद्योगों का विस्तार अधिक तेज़ी से हुआ।

6. नोटबंदी (2016)

घोषित उद्देश्य

काले धन पर रोक लगाना।

नकली मुद्रा समाप्त करना।

आतंकवाद की फंडिंग रोकना।

डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना।

आलोचना

बंद किए गए लगभग सभी नोट बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आए।

असंगठित क्षेत्र और छोटे व्यापारियों को भारी आर्थिक झटका लगा।

लाखों छोटे व्यवसाय प्रभावित हुए।

आलोचकों का मानना है कि काले धन और आतंकवाद की फंडिंग रोकने जैसे प्रमुख उद्देश्य पूरी तरह हासिल नहीं हो सके।

7. वस्तु एवं सेवा कर (GST)

वादा

"एक देश, एक कर"

आलोचना

शुरुआती वर्षों में छोटे व्यापारियों को अनुपालन (Compliance) संबंधी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

अनेक टैक्स स्लैब होने के कारण व्यवस्था अपेक्षा से अधिक जटिल बनी रही।

शुरुआती चरण में व्यापारिक गतिविधियाँ प्रभावित हुईं।

8. स्मार्ट सिटी मिशन

वादा

विश्वस्तरीय शहरी सुविधाओं और आधुनिक शहरों का विकास।

आलोचना

परियोजनाओं की प्रगति अपेक्षित गति से नहीं हुई।

अनेक योजनाएँ वर्षों बाद भी अधूरी या विलंबित रहीं।

9. किसानों की आय दोगुनी करना

वादा

वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करना।

आलोचना

बड़ी संख्या में किसानों को आय में वादा किए गए स्तर की वृद्धि महसूस नहीं हुई।

कृषि लागत लगातार बढ़ती रही।

ग्रामीण आय से जुड़ी समस्याएँ बनी रहीं।

भाग 3 : दूसरा कार्यकाल (2019–2024)

10. पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था

वादा

भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना।

आलोचना

निर्धारित समय सीमा के भीतर यह लक्ष्य हासिल नहीं हो सका।

11. रोजगार सृजन

वादा

देश में बड़े पैमाने पर नए रोजगार उपलब्ध कराना।

आलोचना

शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी एक बड़ी चुनौती बनी रही।

स्थायी नौकरियों की तुलना में असंगठित और गिग अर्थव्यवस्था का विस्तार अधिक हुआ।

12. रुपये की मजबूती

अपेक्षा

मजबूत अर्थव्यवस्था के साथ भारतीय रुपया भी अधिक सशक्त होगा।

आलोचना

समय के साथ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य कमजोर हुआ, जिससे आयातित वस्तुएँ महँगी होती गईं।

13. बढ़ती महँगाई

आलोचना

सामान्य नागरिकों ने लगातार चिंता जताई कि—

पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़ीं।

खाद्य पदार्थ महँगे हुए।

घरेलू खर्चों में लगातार वृद्धि हुई।

14. सामाजिक सौहार्द

वादा

"सबका साथ, सबका विकास"

आलोचना

आलोचकों का कहना है कि धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ा तथा सांप्रदायिक तनाव और नफरत फैलाने वाली घटनाएँ अधिक प्रमुखता से सामने आने लगीं।

15. किसान आंदोलन

मुद्दा

तीन नए कृषि कानून लागू किए गए।

आलोचना

इन कानूनों के विरोध में देशभर में एक वर्ष से अधिक समय तक व्यापक आंदोलन चला।

अंततः सरकार ने तीनों कानून वापस ले लिए।

16. इलेक्टोरल बॉन्ड

वादा

राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता लाना।

आलोचना

आलोचकों का कहना था कि इस व्यवस्था ने राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता को कम किया तथा कॉर्पोरेट प्रभाव को लेकर नए सवाल खड़े किए।

भाग 4 : तीसरा कार्यकाल (2024–वर्तमान)

17. विकसित भारत 2047

वादा

वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना।

आलोचना

आलोचकों का कहना है कि इस दीर्घकालिक लक्ष्य के लिए स्पष्ट, मापनीय और चरणबद्ध रोडमैप अभी भी पर्याप्त रूप से सामने नहीं आया है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में कई बुनियादी चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

18. युवाओं का रोजगार

आलोचना

प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने लाखों युवाओं में निराशा पैदा की।

सरकारी भर्तियों में लगातार देरी रोजगार के अवसरों को प्रभावित करती रही।

19. बढ़ती आर्थिक असमानता

आलोचना

आलोचकों का कहना है कि देश की संपत्ति का बड़ा हिस्सा कुछ बड़ी कंपनियों और सीमित संख्या में अत्यधिक संपन्न लोगों के हाथों में केंद्रित होता गया, जबकि आय असमानता लगातार बढ़ती रही।

20. कृषि एवं ग्रामीण संकट

आलोचना

ग्रामीण मजदूरी पर दबाव बना रहा।

किसानों की कर्ज़दारी चिंता का विषय बनी रही।

कृषि आय में अनिश्चितता समाप्त नहीं हो सकी।

21. मीडिया का माहौल

आलोचना

विपक्षी दलों, पत्रकारों और मीडिया निगरानी संस्थाओं ने प्रेस की स्वतंत्रता, मीडिया स्वामित्व के बढ़ते केंद्रीकरण और संपादकीय स्वतंत्रता को लेकर लगातार चिंताएँ व्यक्त की हैं।

22. केंद्रीय जाँच एजेंसियों का उपयोग

आलोचना

विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि केंद्रीय जाँच एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध चयनात्मक ढंग से किया गया। सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए हमेशा यही कहा कि सभी एजेंसियाँ कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।

विकसित भारत 2047 : आलोचकों के प्रमुख प्रश्न

आलोचकों का मानना है कि यदि भारत को वर्ष 2047 तक वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना है, तो कुछ बुनियादी प्रश्नों के उत्तर तलाशने होंगे—

क्या उच्च बेरोज़गारी के साथ विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है?

क्या शिक्षा की गुणवत्ता में व्यापक सुधार के बिना आर्थिक विकास टिकाऊ रहेगा?

क्या वर्तमान सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय भविष्य की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त है?

क्या घरेलू मूल्य संवर्धन (Value Addition) बढ़ाए बिना भारत वैश्विक विनिर्माण में प्रतिस्पर्धा कर सकता है?

बढ़ती आर्थिक असमानता को कम करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे?

क्या सामाजिक एकता और आपसी विश्वास के बिना सतत विकास संभव है?

निष्कर्ष

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में भारत की राजनीति, प्रशासन और विकास की दिशा में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। समर्थकों का मानना है कि इस दौरान आधारभूत संरचना का अभूतपूर्व विस्तार हुआ, डिजिटल सेवाएँ मजबूत हुईं, सरकारी योजनाओं की पहुँच बढ़ी, भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और दीर्घकालिक विकास के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए गए।

वहीं आलोचकों का कहना है कि काला धन वापस लाने, पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराने, किसानों की आय दोगुनी करने, महँगाई को नियंत्रित करने और व्यापक आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित करने जैसे कई बड़े वादे अब भी पूरी तरह साकार नहीं हो सके हैं या अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए हैं।

किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल राजनीतिक नारों, प्रचार या लोकप्रियता के आधार पर नहीं होना चाहिए। उसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि उसके निर्णयों का आम नागरिक के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा, शासन कितना पारदर्शी और जवाबदेह रहा तथा घोषित वादों का कितना हिस्सा व्यवहार में दिखाई दिया।

एक स्वस्थ लोकतंत्र में नागरिकों का कर्तव्य न तो किसी नेता का अंध समर्थन करना है और न ही अंध विरोध। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक तथ्यों के आधार पर सरकारों का मूल्यांकन करें, अधूरे वादों पर सवाल उठाएँ, वास्तविक उपलब्धियों को स्वीकार करें और सत्ता में बैठे हर व्यक्ति से समान रूप से जवाबदेही की अपेक्षा रखें।

✦ End of Article ✦