सस्ती से महंगी होती उच्च शिक्षा: वर्षों में IIT और IIM की फीस कितनी बढ़ गई?

भूमिका

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) और भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) देश के ऐसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान हैं, जिन्हें इस उद्देश्य से स्थापित किया गया था कि हर प्रतिभाशाली छात्र को, उसकी आर्थिक स्थिति चाहे जैसी भी हो, कम खर्च में विश्वस्तरीय शिक्षा मिल सके। सरकार इन संस्थानों पर वर्षों से भारी सार्वजनिक धन खर्च करती रही है ताकि उच्च शिक्षा सभी के लिए सुलभ बनी रहे।

लेकिन पिछले दो दशकों में इन संस्थानों की फीस लगातार बढ़ी है। संस्थानों का कहना है कि बेहतर शिक्षा, आधुनिक सुविधाएं और बढ़ते खर्च को देखते हुए फीस बढ़ाना जरूरी हो गया है। वहीं आलोचकों का मानना है कि देश के ये प्रमुख सरकारी संस्थान धीरे-धीरे मध्यमवर्ग और साधारण परिवारों की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं।

IIM की फीस छह गुना से भी अधिक बढ़ी

अगर किसी एक संस्थान का उदाहरण सबसे स्पष्ट रूप से इस बदलाव को दिखाता है, तो वह है IIM अहमदाबाद

शैक्षणिक सत्रअनुमानित कुल फीस
2007–08₹4.3–4.5 लाख
2008–10₹11.5 लाख
2015–17लगभग ₹19 लाख
2019–21₹22 लाख
2025–27₹27.5 लाख

IIM अहमदाबाद की आधिकारिक प्रवेश विवरणिका के अनुसार, वर्ष 2025–27 के एमबीए (पूर्व में PGP) कार्यक्रम की कुल फीस ₹27.5 लाख है, जिसमें ट्यूशन फीस और अन्य शैक्षणिक शुल्क शामिल हैं।

यानी 2008 से पहले की तुलना में आज यह फीस छह गुना से भी अधिक हो चुकी है।

IIT की फीस में भी हुआ बड़ा बदलाव

केवल IIM ही नहीं, IIT की फीस में भी पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है।

कई वर्षों तक IIT के B.Tech पाठ्यक्रम की फीस सरकार की ओर से काफी हद तक सब्सिडी वाली रही।

वर्ष 2008 में IIT परिषद की स्थायी समिति ने सुझाव दिया कि B.Tech की वार्षिक ट्यूशन फीस बढ़ाकर ₹50,000 की जाए, क्योंकि लंबे समय से इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ था।

इसके बाद 2016 में सरकार ने अधिकांश छात्रों के लिए वार्षिक ट्यूशन फीस ₹90,000 से बढ़ाकर ₹2 लाख कर दी। हालांकि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के छात्रों के लिए शुल्क में छूट की व्यवस्था जारी रखी गई।

इस फैसले के बाद देशभर में व्यापक बहस छिड़ी और कई जगह छात्रों ने विरोध भी किया।

2008 का फीस विवाद: आखिर हुआ क्या था?

साल 2008 में कई IIM संस्थानों ने एक साथ फीस में भारी बढ़ोतरी की घोषणा की।

उदाहरण के लिए—

IIM अहमदाबाद ने PGP कार्यक्रम की फीस लगभग ₹4.5 लाख से बढ़ाकर ₹11.5 लाख कर दी।

IIM बैंगलोर ने अपने प्रमुख कार्यक्रम की फीस ₹9 लाख कर दी।

इसके अलावा अन्य कई IIM ने भी इसी तरह फीस में बड़ी बढ़ोतरी की घोषणा की।

सरकार ने जताई थी आपत्ति

तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का रुख यह था कि उत्कृष्ट शिक्षा केवल आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सार्वजनिक धन से स्थापित संस्थानों का उद्देश्य देश के हर प्रतिभाशाली छात्र को अवसर उपलब्ध कराना है, चाहे उसकी आर्थिक पृष्ठभूमि कैसी भी हो। तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने फीस वृद्धि पर आपत्ति जताई, संसद में इस विषय पर जवाब दिया और यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली छात्रों की उच्च शिक्षा प्रभावित न हो।

21 अप्रैल 2008 को संसद में दिए गए अपने जवाब में मंत्रालय ने बताया कि—

छह IIM ने PGP कार्यक्रम की फीस बढ़ाई है।

सरकार ने इस मामले का संज्ञान लिया है।

जरूरतमंद छात्रों के लिए छात्रवृत्ति और शिक्षा ऋण की व्यवस्था उपलब्ध है।

यह मामला राष्ट्रीय मीडिया में भी काफी चर्चा में रहा।

द टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि केंद्र सरकार और गुजरात सरकार, दोनों ने IIM अहमदाबाद की फीस में हुई तेज बढ़ोतरी पर आपत्ति जताई थी।

वहीं बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, IIM समीक्षा समिति ने भी सवाल उठाया था कि क्या फीस में इतनी बड़ी बढ़ोतरी वास्तव में जरूरी थी।

IIM ने फीस बढ़ाने के पीछे क्या कारण बताए?

IIM प्रशासन ने फीस बढ़ाने के पक्ष में कई तर्क दिए। उनका कहना था कि—

नए भवन, प्रयोगशालाएं, छात्रावास और अन्य सुविधाएं विकसित करनी थीं।

शिक्षकों के वेतन में लगातार बढ़ोतरी हुई थी।

आरक्षण नीति के बाद छात्रों की संख्या बढ़ी, जिसके कारण अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत पड़ी।

संस्थानों को अपने वित्तीय फैसले लेने की अधिक स्वतंत्रता चाहिए थी।

यही कारण 2008 की चर्चाओं के दौरान बार-बार सामने रखे गए।

2004 का विवाद इससे बिल्कुल अलग था

अक्सर लोग 2008 के फीस विवाद को 2004 की घटना से जोड़ देते हैं, जबकि दोनों पूरी तरह अलग मामले थे।

वर्ष 2004 में केंद्र सरकार ने IIM की फीस घटाकर लगभग ₹30,000 प्रति वर्ष करने का प्रस्ताव रखा था।

IIM प्रशासन ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे—

संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित होगी।

आर्थिक स्थिति कमजोर होगी।

शैक्षणिक मामलों में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ जाएगा।

बाद में सरकार ने यह प्रस्ताव वापस ले लिया।

इसलिए 2004 का विवाद फीस घटाने को लेकर था, जबकि 2008 का विवाद फीस बढ़ाने को लेकर था।

मोदी सरकार के दौरान भी फीस बढ़ती रही

हालांकि फीस बढ़ने की शुरुआत वर्ष 2014 से पहले हो चुकी थी, लेकिन उसके बाद भी यह सिलसिला जारी रहा।

IIT

वर्ष 2016 में अधिकांश छात्रों के लिए B.Tech की वार्षिक ट्यूशन फीस ₹90,000 से बढ़ाकर ₹2 लाख कर दी गई।

आलोचकों ने इसे IIT के इतिहास की सबसे बड़ी फीस वृद्धि में से एक बताया। वहीं सरकार का कहना था कि आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए शुल्क छूट पहले की तरह जारी रहेगी।

IIM

इसी दौरान कई IIM ने भी अपनी फीस में लगातार बढ़ोतरी की।

संसद में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, 2014 से 2016 के बीच सात IIM ने फीस बढ़ाई। इनमें शामिल थे—

IIM अहमदाबाद

IIM बैंगलोर

IIM कलकत्ता

IIM लखनऊ

IIM कोझिकोड

IIM रांची

IIM तिरुचिरापल्ली

सरकार ने स्पष्ट किया कि IIM स्वायत्त संस्थान हैं और अपनी फीस स्वयं तय करते हैं। साथ ही जरूरतमंद छात्रों के लिए वित्तीय सहायता की व्यवस्था भी जारी रहती है।

इसके बाद भी फीस बढ़ने का सिलसिला नहीं रुका और आज IIM अहमदाबाद के प्रमुख एमबीए कार्यक्रम की फीस ₹27.5 लाख तक पहुंच चुकी है।

बढ़ती फीस पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञ और कई सामाजिक संगठनों ने फीस में लगातार हो रही बढ़ोतरी को लेकर कई चिंताएं जताई हैं।

1. क्या सरकारी संस्थान आम लोगों की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं?

आलोचकों का कहना है कि जिन संस्थानों की स्थापना जनता के टैक्स के पैसे से हुई है, उनकी शिक्षा आम लोगों की पहुंच में रहनी चाहिए। उनका मानना है कि इन संस्थानों को धीरे-धीरे निजी संस्थानों की तरह महंगा नहीं बनाया जाना चाहिए।

2. शिक्षा ऋण पर बढ़ती निर्भरता

समर्थकों का तर्क है कि IIT और IIM के अधिकांश छात्रों को अच्छी नौकरी मिल जाती है, इसलिए शिक्षा ऋण चुकाना मुश्किल नहीं होता।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि बढ़ती फीस और कर्ज का डर कई प्रतिभाशाली छात्रों, खासकर मध्यम और निम्न आय वाले परिवारों के बच्चों को, इन संस्थानों में प्रवेश लेने से रोक सकता है।

3. स्वायत्तता के साथ जवाबदेही भी जरूरी

IIM का कहना है कि उन्हें वैश्विक स्तर की शिक्षा बनाए रखने के लिए वित्तीय और प्रशासनिक स्वतंत्रता चाहिए।

वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संस्थानों को अधिक स्वायत्तता दी जाती है, तो फीस बढ़ाने जैसे फैसलों में पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए।

निष्कर्ष

इतिहास पर नजर डालें तो कुछ बातें साफ दिखाई देती हैं—

2004 में विवाद IIM की फीस घटाने के सरकारी प्रस्ताव को लेकर था, जिसका IIM प्रशासन ने विरोध किया।

2008 में विवाद फीस में भारी बढ़ोतरी को लेकर हुआ, जिस पर सरकार ने सवाल उठाए और संसद में भी चर्चा हुई।

2014 के बाद भी IIT और IIM दोनों में फीस बढ़ती रही। वर्ष 2016 में IIT की ट्यूशन फीस में बड़ी बढ़ोतरी हुई, जबकि कई IIM की प्रमुख MBA फीस बढ़कर ₹20 लाख से ₹27.5 लाख के बीच पहुंच गई।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या भारत के प्रमुख सरकारी शिक्षण संस्थानों को धीरे-धीरे पूरी तरह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जाना चाहिए, या फिर सरकार को इन पर पर्याप्त निवेश जारी रखना चाहिए ताकि हर प्रतिभाशाली छात्र, उसकी आर्थिक स्थिति चाहे जैसी भी हो, कम खर्च में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा हासिल कर सके?

यह केवल फीस का सवाल नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि आने वाले वर्षों में भारत की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा किन लोगों की पहुंच में होगी—सिर्फ आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों की, या हर उस छात्र की जिसके पास प्रतिभा है।

 

 

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